वैसे तो गणेश पूजा से जुड़ी बहुत सी कहानियाँ आप पढ़े और सुने होंगे, लेकिन आज का लेख उन सबसे थोड़ा हटकर है। प्रासंगिक तो है ही, साथ ही उन बिंदुओं पर केंद्रित है जिसको लेकर बहुत से सवाल आपके मन में चल रहा होगा। इस लेख के माध्यम से आपके उन्हीं सभी सवालों का समुचित और सटीक जवाब देने का प्रयास किया है हमनें।
आज गणपति उत्सव का स्मरण मात्र से हमारे सामने अनेकों तस्वीर उभर आते हैं। महाराष्ट्र की सजी-धजी गलियां, बड़े-बड़े पंडाल, ढ़ोल-तासों की गूंज, गणपति बप्पा मोरया का उद्घोष, सांस्कृतिक आयोजन, श्रद्धालुओं की लंबी कतार और अंत में विशाल शोभायात्रा एवं भावुकता से ओतप्रोत विसर्जन जैसे क्षण हमारे रोम-रोम में सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर देता है।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज गणपति उत्सव की जो तस्वीर हमारे सामने है, यह हमेशा से ऐसा ही था? क्या लोकमान्य तिलक ने ही सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत की? और यदि तिलक से पहले भी गणेश पूजा की परंपरा थी तो उसका स्वरूप कैसा था?
इन सभी प्रश्नों के जवाब हमें केवल धार्मिक इतिहास में ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास में भी मिलते हैं।
आजका सार्वजनिक गणेशोत्सव सदियों पुरानी भारत के धार्मिक परंपरा, महाराष्ट्र की सामाजिक स्मृति, पेशवा काल में प्राप्त राजकीय संरक्षण, उन्नीसवीं सदी के विभिन्न सामाजिक बदलाव और देशव्यापी आंदोलन के दौर से गुजरते हुए अपने वर्तमान स्वरूप तक पहुंचा है। और इस पूरी यात्रा में बाल गंगाधर तिलक की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। लेकिन ये कहानी केवल तिलक से शुरू नहीं होती।
गणेश पूजा की शुरुआत किसने और कब की?
गणेश पूजा की शुरुआत किसने की थी, ये जानने के लिए अतीत के पन्नों को पलटने के बाद भी ऐसा कोई ठोस आधार नहीं मिलता, जिससे ये प्रमाणित हो कि किसी एक व्यक्ति द्वारा इसकी शुरुआत की गई। गणपति पूजा सदियों पुरानी भारतीय परम्पराओं की हिस्सा रही है।
महाराष्ट्र में पेशवा काल में गणेश पूजा का विशेष महत्व था। उन दिनों पुणे में पेशवाओं द्वारा धार्मिक और राजकीय दोनों ही स्तर पर इसे संरक्षण मिला जो लोगों के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। लोग सार्वजनिक रूप से गणपति आयोजन में शामिल होते थे।
इससे स्पष्ट है कि तिलक ने गणपति पूजा शुरू नहीं कि थी। उनका योगदान किसी खास उद्देश्य पर केंद्रित था, और जिसके लिए उन्होंने उल्लेखनीय प्रयास भी किए। उनके पहले भी गणपति महाराष्ट्र के धार्मिक और राजकीय परिदृश्य में गहराई से मौजूद थे। तिलक ने सदियों से चली आ रही परंपराओं को एक ऐसे सार्वजनिक मंच में बदलने का प्रयास किये, जहाँ बड़े संख्यां में लोग संगठित हो सके।
और यहीं से लोकमान्य तिलक द्वारा गणपति पूजा के कहानी एक नए मोड़ पर पहुंचती है।
तिलक से पहले गणेश पूजा की तस्वीर कैसी थी?
पेशवा शासन के अंत के बाद भारत अंग्रेजो के अधीन हो गया और परिस्थितियां काफी बदल गई। पेशवाओं द्वारा चली आ रही सार्वजनिक गणेशोत्सव की परंपरा धीरे-धीरे परिवारों और समुदायों तक सिमटता चला गया। इसतरह सार्वजनिक आयोजन का दायरा महज धार्मिक आयोजन बनकर रह गए। लोग अपने घरों में मूर्ति स्थापित करते, पूजा करते और विसर्जन करते थे।
लेकिन इसका अर्थ ये नहीं है कि सामूहिक आयोजन पूरी तरह समाप्त हो चुका था। कई स्थानों पर लोग अब भी एकजुट होकर गणपति उत्सव मनाते थे।
इसलिए तिलक के सामने ये कोई नई परंपरा नहीं थी, बल्कि सदियों से मौजूद पुरानी परंपरा को एक नया स्वरूप देना था। बदलते समय के हिसाब से सामाजिक और सार्वजनिक रूप में पहले के अपेक्षा ज्यादा प्रभावी बनाना था। तिलक के सामने ये चुनौती था कि कैसे वो पेशवाओं के दौर से चली आ रही सार्वजनिक गणेशोत्सव की परंपरा को जीवंत रखे जो अंग्रेजों के आने के बाद थोड़ा संकुचित रूप ले चुका था।
सार्वजनिक गणेशोत्सव की कहानी में अक्सर छूट जाने वाले नाम 'भावसाहेब रंगारी'
जब-जब सार्वजनिक गणेशोत्सव की चर्चाएं होती है तो इतिहास के एक महत्वपूर्ण नाम भावसाहेब लक्ष्मण जिन्हें भाव रंगारी के नाम से भी जाना जाता है, का नाम कहीं पीछे छूट जाता है। सार्वजनिक गणेशोत्सव को लेकर जब बात भूमिका की होती है तो केवल लोकमान्य तिलक को सामने रख सारा श्रेय उन्हें दे देना इतिहास के एक हिस्से को अनदेखा करने जैसा होगा। 'भाव रंगारी ट्रस्ट' का दावा है कि उन्होंने ही वर्ष 1892 में सार्वजनिक गणेशोत्सव का आयोजन किया था। हालांकि कुछ इतिहासकारों और ऐतिहासिक स्रोत इसे वर्ष 1893 से जोड़ते हैं। आयोजन वर्ष को लेकर मतभेद है, इसलिए इस बहस में पड़ने के बजाय भाव रंगारी एवं अन्य स्थानीय लोगों की शुरुआती भूमिका को स्वीकार करना अधिक उचित होगा। साथ ही पुणे में तिलक के पहले भी सार्वजनिक गणपति के आयोजन की पृष्ठभूमि तैयार होने की दिशा में प्रयास शुरू हो चुके थे जैसी बातों को खारिज नहीं किया जा सकता है।
फिर तिलक की भूमिका क्या थी और वे कहाँ आते हैं?
1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश शासन काफी भयभीत था। इसलिए राजनीतिक सभाओं, लोगों के एकजुट होने तथा किसी भी तरह के सामूहिक आयोजनों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। दूसरी ओर तिलक ऐसे रास्ते की तलाश में थे, जिनसे महाराष्ट्र के आम जनमानस को एकजुट किया जा सके। वे जानते थे कि महाराष्ट्र के जनजीवन में गणपति का महत्व क्या है। आस्था और धर्म के नाम पर लोग गणपति से किस तरह जुड़े हुए हैं, क्योंकि गणपति किसी खास समुदाय अथवा वर्ग या परिवार तक सीमित देवता नहीं थे। उनके नाम पर आयोजित होने वाला उत्सव लोगों को जोड़ने का एक बेहतर माध्यम बन सकता था। इसलिए तिलक ने गणपति उत्सव को ही ब्रिटिश शासन के खिलाफ अपना हथियार बनाने की ठान ली और प्रयास में लग गए।
तिलक स्वयं एक जुझारू पत्रकार भी थे। 'केसरी' हिंदी में और 'मराठा' अंग्रेजी भाषा में उन दिनों उनके दो समाचार पत्र प्रकाशित हुआ करता था। वे केसरी के जरिए अपनी राजनीतिक एवं देशव्यापी मुद्दों पर लोगों के साथ संवाद स्थापित करते थे। इसतरह 1893 में सार्वजनिक आयोजनों में धार्मिक कार्यक्रमों के साथ-साथ भाषण, गीत, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सामाजिक गतिविधियों का दौर शुरू हुआ और पेशवा काल के अंत के बाद गणपति उत्सव मनाने की परंपरा के विस्तार का जो दायरा सिमट सा गया था, वो एकबार फिर से सामुदायिक भागीदारी तक पहुंचने लगा। आगे चलकर 1896 में शिवाजी उत्सव को भी सार्वजनिक रूप देते हुए तिलक ने अपने अभियान को और अधिक मजबूत और विशाल बनाया।
लेकिन क्या तिलक के गणपति उत्सव में समाज के सभी वर्गों को साथ जोड़ने की भावना थी?
यहीं से सामने आता है इतिहास का दूसरा पक्ष। तिलक के समर्थकों के लिए सार्वजनिक गणेशोत्सव आम जनमानस को संगठित करने और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध लोगों में राष्ट्रप्रेम की भावना जगाने का माध्यम था। हालाँकि, इतिहासकारों में इसबात को लेकर भी मतभेद रहा है कि इससे मुस्लिम समुदाय और कुछ गैर ब्राह्मण तथा वंचित समूहों के साथ दूरी भी पैदा हुई है। दरअसल, उन दिनों महाराष्ट्र में जाति व्यवस्था और सामाजिक असमानताएँ चरम पर थी। तिलक स्वयं भी कुछ सामाजिक बिंदुओं पर अपना रूढ़िवादी रुख रखते थे। इसलिए सार्वजनिक गणेशोत्सव को केवल राष्ट्रीय एकजुटता एवं सामाजिक एकीकरण के रूप में देखना इतिहास के दूसरे पक्ष को नजरअंदाज करना होगा। यही वो जगह है जहाँ ज्योतिबा फुले और तिलक के विचारों में अंतर को समझना जरूरी हो जाता है।
ज्योतिबा फुले और तिलक : दो महान नेता के विचारों में अंतर
जब भी बात महाराष्ट्र की हो तो ज्योतिबा फुले और लोकमान्य तिलक जैसे नाम सबसे पहले जहन में आता है। हालांकि, दोनों के विचारधारा एवं प्राथमिकताएं एकदूसरे से काफी अलग थी। जहाँ ज्योतिबा फुले सामाजिक समानता और शोषित-वंचितों के उत्थान, जातिगत भेदभाव और उच्चवर्ग के वर्चस्व के विरुद्ध अपनी बात प्रखरता से रखते थे। वहीँ तिलक का ध्यान सामाजिक एकता और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सामाजिक जनजागरण पर था। अर्थात, एकतरफ सामाजिक समानता एवं जाति विरोध का प्रश्न था तो दूसरी तरफ राष्ट्रीय एकीकरण और राजनीतिक स्वतंत्रता का प्रश्न। अतः दोनों विचारधारा में टकराव और तनाव का होना स्वाभाविक था।
क्या ज्योतिबा फुले और तिलक में गणपति को लेकर सीधा विवाद था?
यह कहना बहुत कठिन है और इसका इतिहास उतना ही जटिल। हाँ, इसबात का प्रमाण मिलता है कि फुले ने धार्मिक कार्यों के नामपर शोषित-वंचितों एवं निम्नवर्गीय समुदाय से आर्थिक शोषण का विरोध किया था। फुले ने अपनी रचना 'शोधकार्यचा असूड़' में धार्मिक अनुष्ठानों पर पंडित-पुरोहितों द्वारा लेने वाली दान-दक्षिणा की आलोचना की थी। वहीं, तिलक ने गणपति जैसे लोकप्रिय धार्मिक उत्सव को राजनीतिक सामुदायिक जनचेतना के लिए इस्तेमाल किया। इसलिए दोनों के बीच का अंतर सिर्फ गणपति उत्सव को लेकर नहीं था। अंतर था तो बस इसबात को लेकर कि समाज को बदलने का सही रास्ता क्या होना चाहिए। फुले के लिए सामाजिक बराबरी बुनियादी प्रश्न थे तो तिलक के लिए राष्ट्रीय एकता सबसे महत्वपूर्ण था। इसलिए बाद के इतिहास लेखन में गणेशोत्सव को ब्राह्मण बनाम गैर ब्राह्मण और सामाजिक सुधार बनाम राजनीतिक राष्ट्रवाद के व्यापक संघर्ष में पिसता देखा गया है। इस इतिहास को देखते समय इनदोनों नेताओं में किसी एक को सही और दूसरे को गलत साबित करने के बजाय उनके समय और विचारों को केंद्र में रखकर देखना ज्यादा उचित है।
सार्वजनिक गणेशोत्सव का विस्तार
तिलक के प्रयासों के बाद सार्वजनिक गणेशोत्सव का विस्तार महाराष्ट्र के बाहर अलग-अलग शहरों में होने लगा। गणपति अब केवल घर के देवता नहीं रहे थे। वे मोहल्ले के गणपति बने, सार्वजनिक मंडल के गणपति बने और धीरे-धीरे पूरे समुदाय की पहचान का हिस्सा बन गए। बड़े-बड़े पंडाल, सांस्कृतिक कार्यक्रम, संगीत और विसर्जन की शोभायात्राएं इस उत्सव का हिस्सा बनने लगी।
यही सार्वजनिक स्वरूप आगे चलकर गणेशोत्सव की सबसे बड़ी ताकत बना।
लालबागचा राजा : गणपति के नए दौर की शुरुआत
मुम्बई में सार्वजनिक गणेश पूजा ने आगे चलकर अपना अलग स्वरूप विकसित किया। इसी यात्रा में लालबागचा राजा का नाम विशेष रूप से सामने आता है। लालबागचा राजा की स्थापना 1934 में हुई। इसके पीछे लालबाग क्षेत्र के स्थानीय लोगों और व्यापारियों की आस्था और सामुदायिक प्रयास की कहानी जुड़ी है। (इसके पीछे की पूरी कहानी को किसी दूसरे लेख में शामिल करने का प्रयास करेंगे)
समय के साथ लालबागचा राजा मुम्बई के सबसे प्रसिद्ध गणपति आयोजनों में शामिल हो गया। यहां हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। देश ही नहीं विदेशों से भी भारी संख्या में भक्तों का आना होता है। भक्तों की भारी भीड़ लालबागचा राजा के एक झलक दर्शन मात्र के लिए घंटों कतार में खड़े रहते हैं।
लालबागचा राजा यह दिखाता है कि सार्वजनिक गणेशोत्सव किस तरह समय के साथ धार्मिक आयोजन से आगे बढ़कर सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन सकता है।
महाराष्ट्र से दुनिया तक विस्तार
गणपति की यात्रा महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रही। महाराष्ट्र से दूसरे शहर में जाने वाले लोगों ने अपनी सांस्कृतिक परंपराएं भी अपने साथ लेकर गए। धीरे-धीरे गणपति भारत के दूसरे हिस्सों में भी लोकप्रिय हुआ। महाराष्ट्र के बाद गुजरात, मध्यप्रदेश, दिल्ली के साथ-साथ पूरे भारत में लोगों के बीच मनाया जाने लगा।
फिर भारतीयों का विदेशों की ओर प्रवास बढ़ा। अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, खाड़ी देशों और दुनिया के दूसरे हिस्सों में बसे भारतीय समुदायों ने गणपति उत्सव को वहाँ भी मनाना शुरू किया। विदेश में रहने वाले भारतीयों के लिए गणपति केवल पूजा का अवसर नहीं है। वह अपने देश, परिवार, बचपन और संस्कृति से जुड़ने का माध्यम भी बन सकता है। प्रवासी भारतीयों के लिए उत्सव के साथ-साथ अपने मिट्टी की खुशबू, जड़ों से जुड़ने और अनेकों संस्मरण को एहसास करने का एक जरिया भी हो सकता है। आज सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों ने इस उत्सव की तस्वीर को दुनिया के किसी भी कोने तक पहुंचा दिया है।
इसलिए गणपति उत्सव का वैश्वीकरण केवल भौगोलिक विस्तार नहीं है। यह भारतीय संस्कृति एवं सांस्कृतिक स्मृति का विस्तार भी है।
तो क्या तिलक ने गणपति को ग्लोबल बनाया?
इस सवाल का जवाब यही होगा कि तिलक ने गणपति पूजा को ग्लोबल नहीं बनाया, लेकिन सार्वजनिक गणेशोत्सव के विस्तार में उनकी भूमिका ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण थी।
गणपति पूजा उनसे बहुत पुरानी परंपरा थी। सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआती पहल में भावसाहेब रंगारी जैसे लोगों की भूमिका थी। लेकिन तिलक ने इसे व्यापक जन संगठन, सामाजिक भागीदारी और राष्ट्रवादी चेतना से जोड़ने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसके बाद कई पीढ़ियों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। गणेश मंडल बने, मुम्बई में लालबागचा राजा जैसे बड़े आयोजन लोकप्रिय हुए, प्रवासी भारतीय इसे विदेशों तक लेकर गए और आधुनिक मीडिया ने इसे पूरी दुनिया तक पहुँचाने में मदद की।
इसलिए गणपति उत्सव की वैश्विक यात्रा किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों की सामूहिक यात्रा है।
आशा है पूरी लेख आपको पसंद आया होगा। गणपति पूजा से जुड़ी बहुत सी ऐसी बातों को जान सके जिसके बारे में अब तक नहीं पढ़े थे। इस लेख से जुड़े यदि आपका कोई सवाल अथवा सुझाव हो तो टिप्पणी कर हमसे अवश्य साझा करें। आगे भी ऐसे उपयोगी और ज्ञानवर्धक लेख पढ़ने के लिए आप हमारे वेबसाइट को फॉलो (सब्सक्राइब) कर सकते है।
सावन-भादो,
माटी से मन तक
अपनी मिट्टी, अपनी भाषा, अपनी यादों और अपने विचारों से जुड़ने का एक आत्मीय मंच।
0 टिप्पणियाँ